हिन्दी के हेड कविता क्यों नहीं लिखते ?
Written by मसिजीवी on 3:39 PM“हिन्दी के हेड हमेशा कवि-आलोचक होते हैं, एकाध तो उपन्यास लिखने की धमकी भी दे रहे हैं। ये लोग इसीलिए लेखक को नीची नजर से देखते हैं। साहित्य के औजार हैं इनके पास। जब जी चाहा, कुछ भी गढ़ लिया। ये लोग समझदार बहुत होते हैं , लेकिन स्याने ? किसने कहा था एजुकेशन कम्स बट विज़डम लिंगर्ज। “
- स्वदेश दीपक (मैंने मांडू नहीं देखा, पृ. 20)
स्वदेश दीपक के इस कथन के आलोक में अपने विश्वविद्यालय के पुराने, हाल फिलहाल और बेहाल नए-पुराने सब हेड (विभागाध्यक्ष...क्या भारी शब्द है न) को याद कर जाता हूँ... डा. नगेन्द्र, भारी भरकम आलोचक...गैर कवि..और शायद कवित्व विरोधी भी।
और फिर सर्वप्रोफेसर सुरेशचंद्र गुप्त, नित्यानंद तिवारी, बालीजी, महेन्द्र कुमार.... और प्रो. निर्मला जैन ( स्वदेश दीपक उनके लिए तो ये कथन लिखा ही है) ...और अब प्रो. पचौरी सब के सब एक के बाद एक आलोचक... कवि कोई नहीं। लिखे गए नामों के अलावा कई 'वगैरह' भी हैं जो हेडत्व को प्राप्त हुए हैं और वे 'वगैरह' इसलिए हैं कि वे कविता तो छोडो कुछ्छे नी लिखते। हमारे विश्वविद्यालय को छोडि़ए तमाम हिन्दी के हेड शायद इसी व्याधि से दर्ज हैं, मैं हैरान हूँ कि विश्वविद्यालयी हिन्दी की गत का इस तथ्य से कोई संबंध बनता है कि हिन्दी के हेड कविता नहीं लिखते ?
पुनश्च: मैं भी कविता लगभग नहीं ही लिखता :)
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