मैं चर्चाता हूँ...इसलिए मैं हूँ

Written by मसिजीवी on 3:46 PM

अगर इंसान पहचान के कई टुकड़ों में साथ साथ जीता है पिता, मित्र, धर्म, जाति... तो भला ब्‍लॉगर की क्‍योंकर एकमुश्‍त पहचान होगी... वो भी अपने अलग अलग चिट्ठों, पोस्‍टों, टिप्‍पणियों से पहचान हासिल करता है... हम भी करते हैं, पर जब कोई हमसे पूछता है तो जिस पहचान को हम मसिजीवी होने के बाद सबसे अहम मानते हैं वह है चर्चाकार होना। चिट्ठाचर्चा के इतिहास पर हमारी कोनो पीएचडी नहीं है, सुकुलजी इतिहास दर्ज कर चुके हैं बांच लें, चिट्ठाचर्चा ने 1000 पोस्‍टों का सफर पूरा करने के अवसर पर हम केवल इस मंच से अपने जुड़ाव की बात करेंगे और नहीं।

मित्रों के सद्भाव के चलते जनसत्‍ता से ब्‍लॉगों पर एक स्‍तंभ जिखने की पेशकश हुई... पहले अविनाश अपना कॉलम लिखते थे पर उन्‍होंने भास्‍कर ज्‍वाइन कर लिया तो जाहिर है जनसत्‍ता में जारी नहीं रख सकते थे, थानवीजी से फोन पर बात हुई उन्‍होंने कहा कि आपका कालम है खुद कोई नाम रखें... 'चिट्ठाचर्चा' हमने बिना झिझक कहा, आखिर नियमित रूप से पोस्‍टों की चर्चा और भला क्‍या नाम आ सकता था हमारे मन में। जब तक जनसत्‍ता में कॉलम आया चिट्ठाचर्चा नाम ही रहा कभी मन में नहीं आया कि ये शुक्‍लजी के मॉडरेशन में चल रहे किसी सामूहिक ब्‍लॉग का नाम है... भले ही शुक्‍लजी हमसे सौगुनी मेहनत करते हैं चर्चा पर, किंतु चिट्ठाचर्चा हम सब का है... ये 'अविनाश के' मोहल्‍ले या 'यशवंत के' भड़ास सा कम्‍यूनिटी ब्‍लॉग नहीं है ये वाकई हमारी चिट्ठाचर्चा है इसलिए जब कोई टर्राते हुए इसे सुकुलजी के किन्‍हीं गुट की चर्चा कहता है तो झट मन में आता है बड़े आए सुकुलजी...(नारद को लेकर भी ऐसा ही मन में आता था अभी तक तो उम्‍मीद है कि चर्चा के मामले में ये विश्‍वास बना रहेगा)  

ऐसा नहीं कि नाराजगी नहीं हुई खुद अनूप धुरविरोधी प्रकरण में हमसे धुर असहमत थे... उनकी क्‍या कहें घर में खुद नीलिमा असहमत थीं

धुरविरोधी के विरोध का अपना एकदम निजी तरीका है इसपर सेंटी होने की भी जरूरत नहीं है उक्त विचार भी आपके एकदम निजी हैं

पर हमने चर्चा का विषय इसे बनाया एक बार नहीं लगा कि चिट्ठाचर्चा अनूप के मॉडरेशन में चल रहा ब्‍लॉग है उन्‍हें आपत्ति होगी। दरअसल चिट्ठाचर्चा में वैयक्तिकता व सामुदायिकता का जो संतुलन है उसे महसूसने की जरूरत है इसे साधुवादी वाह वाह से नहीं पकड़ा जा सकता। आप कौन सी पोस्‍ट चर्चा के लिए चुनेंगे ये प्रक्रिया राग द्वेष से मुक्‍त नहीं है होना मुश्किल भी है पर सिद्धांतत: चर्चाकार मानते हैं कि चर्चाकार को अपने विवेक से यह तय करने का हक है इसलिए इन आपत्तियों को कभी तूल नहीं दिया जाता कि कौन सी पोस्‍टें चुनी गईं... इसी प्रकार चर्चाकार की दृष्टि भी स्‍वतंत्र है किंतु दूसरी ओर सरोकारों की एक स्‍वीकृत सामुदायिकता है। पिछले कुछ महीनों से मेरी, नीलिमा तथा सुजाता की   ब्‍लॉगिंग में सक्रियता कम हुई है पर कम से कम इतना प्रयास अवश्‍य करते हैं कि चर्चा अवश्‍य हो जाए भले ही संक्षिप्‍त रह जाए वैसे इसमें कितना योगदान हमारी प्रतिबद्धता है कितना अनूपजी के तकादों का, यह कहना कठिन है।

भविष्‍य की ओर घूरें तो मुझे लगता है कि जैसा कि इलाहाबाद में इरफान ने अपने परचे में कहा था...हम ब्‍लॉगर खुद ब्‍लॉगिंग पर लिखना बांचना पसंद करते हैं इससे तय है कि चर्चा की यात्रा अभी चलेगी...नए चर्चा मंच दिखाई दे रहे हैं...उनकी मौलिकता को लेकर कुछ संशय है पर ये संशय भी मिटेंगे...अपनी तो राय है मोर दि मेरियर।

हिन्‍दी के हेड कविता क्‍यों नहीं लिखते ?

Written by मसिजीवी on 3:39 PM

हिन्‍दी के हेड हमेशा कवि-आलोचक होते हैं, एकाध तो उपन्‍यास लिखने की धमकी भी दे रहे हैं। ये लोग इसीलिए लेखक को नीची नजर से देखते हैं। साहित्‍य के औजार हैं इनके पास। जब जी चाहा, कुछ भी गढ़ लिया। ये लोग समझदार बहुत होते हैं , लेकिन स्‍याने ? किसने कहा था एजुकेशन कम्‍स बट विज़डम लिंगर्ज। “

- स्‍वदेश दीपक (मैंने मांडू नहीं देखा, पृ. 20)

स्‍वदेश दीपक के इस कथन के आलोक में अपने विश्‍वविद्यालय के पुराने, हाल फिल‍हाल और बेहाल नए-पुराने सब हेड (विभागाध्‍यक्ष...क्‍या भारी शब्द है न) को याद कर जाता हूँ... डा. नगेन्‍द्र, भारी भरकम आलोचक...गैर कवि..और शायद कवित्‍व विरोधी भी। head और फिर सर्वप्रोफेसर सुरेशचंद्र गुप्‍त, नित्‍यानंद तिवारी, बालीजी, महेन्‍द्र कुमार.... और प्रो. निर्मला जैन ( स्‍वदेश दीपक उनके लिए तो ये कथन लिखा ही है) ...और अब प्रो. पचौरी सब के सब एक के बाद एक आलोचक... कवि कोई नहीं। लिखे गए नामों के अलावा कई 'वगैरह' भी हैं जो हेडत्‍व को प्राप्‍त हुए हैं और वे 'वगैरह' इसलिए हैं कि वे कविता तो छोडो कुछ्छे नी लिखते। हमारे विश्‍वविद्यालय को छोडि़ए तमाम हिन्‍दी के हेड शायद इसी व्‍याधि से दर्ज हैं, मैं हैरान हूँ कि विश्‍वविद्यालयी हिन्‍दी की गत का इस तथ्‍य से कोई संबंध बनता है कि हिन्‍दी के हेड कविता नहीं लिखते ?

पुनश्‍च: मैं भी कविता लगभग नहीं ही लिखता :)

इलाहाबाद...कुर्सियॉं औंधा दी गई हैं, पोडियम दबे पड़े हैं

Written by मसिजीवी on 10:04 AM

ब्‍लॉगजगत में हलकान तत्‍व की प्रधानता व सजगता देख दिल बाग बाग हुआ जाता है। लोग हैदराबाद की उपेक्षा और वर्धा वालों की निमंत्रण सूची की अनुपयुक्‍तता से भी दुखी हैं... सजगता भली चीज है इसलिए इन आशंकाओं का स्‍वागत होना चाहिए। पर हम एक ब्‍लॉगर नजर से बात साफ कर देना चाहते हैं कि ब्‍लॉगिंग कोई कूढे का ढेर नहीं कि जिस पर खड़ा होकर कुक्‍कुट मसीहा होने की घोषणा कर सकें...चलिए एक ब्‍लॉगर नजर से बताते हैं कि क्‍यों विश्‍वविद्यालयी आयोजन उत्‍सव भले ही हों...भय खाने की चीज नहीं हैं- अनूपजी हमें यहीं छोड़कर कानपुर चले गए हैं हम भी गेस्‍टहाउस से उसी परिसर में आ गए हैं जहॉं कार्यक्रम था  ताजा हाल ये है कि

नामवरी कुर्सियॉं औंधा दी गई हैं, पोडियम दबे पड़े हैं

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आसनों की अट्टालिका कुछ कहती है क्‍या ?

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घोषणापत्रों की गत ये हो गई है

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अभी संजयजी ने बताया कि हम चौथा पॉंचवा खंबा हैं...

बाहर मीडिया से मिले तो बोल पड़े- यह पांचवा स्तंभ है. संभवत: नामवर सिंह भी मानते हैं कि चार स्तंभ कमजोर हुए हैं इसलिए नियति के कारीगर ने इस पांचवे स्तंभ को गढ़ने का काम शुरू कर दिया है.

गिनती आप खुद कर लें कि कौन सा है पर इतना तय है मीडिया एक खंबा तो है .. देख लें-

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बहुत से लोगों को आपत्ति है कि कुछ को फूल मिले कुछ को नहीं... तो जान लें कि हर गुलदस्‍ते की परिणति एक ही है -'कचरापेटी'

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तो तंबू बंबू उखड़ चुका है...लोगों से मिले उन्हें जाना.. मनीषा, आभा, प्रियंकर, अनूप, इरफान, भूपेन, रवि, अफलातून, बोधिसत्‍व, विनीत, अजीत,प्रवीण....और भी इतने लोग... किसी पर कोई प्राइस टैग नहीं था, कोई बिकाऊ नहीं था... सब जानते हैं मानते हैं कितनी ही संगोष्‍ठी हों... ब्‍लॉगिंग वो तो नूंहए चाल्‍लेगी :)

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पुरालेख

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